स्त्रियाँ अवन्दनीय है। - गौत्तम बुद्ध

 अम्बेडकरवादी और वामपंथी ये कहते हैं कि हिन्दु धर्म पुरुषवादी धर्म है। यहाँ स्त्रियों का कोई महत्त्व नही है। ये लोग बुद्ध धम्म को स्त्रियों को अधिकार देने वाला भी मानते हैं तथा ऐसा भी मानते हैं कि बुद्ध ने स्त्रियों को सम्मान दिया था। किन्तु इनकी ये बात असत्य है। जब हम त्रिपिटकों का अध्ययन करते हैं तो ये बात स्पष्ट हो जाती है कि बुद्ध ने एक नर भिक्षु और मादा भिक्षु में पर्याप्त भेदभाव रखा है। बुद्ध संघ में स्त्री अधिक परतंत्र है। इतना ही नही बुद्ध ने 10 अवन्दनीयों में स्त्री को भी अवन्दनीय कहा है।

विनयपिटक के चुल्लवग्ग 6{3/5 में बुद्ध कहते हैं -

"भिक्षुओं! यह दश अवन्दनीय हैं -

पूर्व के उप सम्पन्न को पीछे का उपसम्पन्न। अन् उपसम्पन्न अवंदनीय है। नाना सह - वासी, वृद्धतर अधर्मवादी अवंदनीय है। स्त्रियाँ अवन्दनीय है। नपुंसक अवन्दनीय है। परिवास दिया गया अवन्दनीय है।........

इस तरह दश अवन्दनीयों के बाद 3 वन्दनीयों का उल्लेख करते हुए बुद्ध कहते हैं -

यह तीन वन्दनीय हैं -

1 पीछे उपसम्पन्न द्वारा पहिले का उपसम्पन्न वन्दनीय है।

2 नाना सहवास वाला वृद्धतर धर्मवादी वन्दनीय है।

3 देव - मार - ब्रह्मा सहित सारे लोक के लिये, देव - मनुष्य - श्रमण - ब्राह्मण सहित सारी प्रजा के लिये, तथागत अर्हत सम्यक बुद्ध वन्दनीय है।


इन वाक्यों से स्पष्ट है कि बुद्ध के लिए स्त्रियाँ अवन्दनीय है अर्थात् सम्मान और सत्कार के योग्य नही है। जबकि इसके विपरीत मनु महाराज ने स्त्रियों को प्रथम पूजनीय कहा है। स्त्रियाँ बुद्ध धम्म में वन्दनीय न होने के कारण बुद्ध भी नही बन पायी हैं अभी तक के सारे 27 के लगभग बुद्ध बौद्ध धम्म में पुरुष और द्विज वर्ण के ही हैं।

ये भेदभाव बुद्ध धम्म में स्त्रियों के प्रति है। आजकल के तथाकथित नारीवादियों और अम्बेडकरवादियों को इस बौद्ध ग्रंथ विनय पिटक का भी उसी प्रकार विरोध करना चाहिये, जिस प्रकार ये हिन्दू धर्म की कुछ पुस्तकों से कुछ स्त्री विरोधी बातें (प्रक्षिप्त) चेंपकर करते हैं। यदि नारीवादी और अम्बेडकरवादी ऐसा न करें तो इन्हें दोगला और पक्षपाती समझना चाहिये।

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 

1) विनय पिटक - अनु. राहुल सांस्कृत्यायन 





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