अशोक के काल में यज्ञ, संस्कृत भाषा और वेदों की सिद्धि

 नवबौद्धों को बस शिलालेख से आगे कुछ दिखता ही नहीं है शायद अब भी उनका हठ इतना आडे आएगा कि वे इस शिलालेख पर भी कुतर्क या कहानियाँ बनाने से पीछे नहीं हठेंगे। प्रस्तुत दोनों चित्र "सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार" द्वारा प्रकाशित पुस्तक "अशोक के धर्मलेख" से है। इस पुस्तक में अशोक के शिलालेखों के अनुवाद योग्य एवं प्रमाणिक विद्वानों द्वारा किए गए हैं। इसमें से प्रथम चित्र अशोक के कालसी चट्टान का है जिसमें अशोक लिखता है कि - "मेरे राज्य में कोई भी जीव मार कर होम न करें" अब देखे कि होम का उल्लेख यहाँ स्पष्ट है और होम बिना मन्त्रों के नहीं होता है "यज्ञकर्मण्यजपन्यूङ्खसामसु"- अष्टाध्यायी 1.2.34 

अब कई लोग कहेंगे कि इस तरह तो आप यज्ञ में जीव हत्या वैदिक सिद्ध कर रहें है लेकिन ऐसा नहीं है यहां केवल यज्ञ होना दिखाना है, यज्ञ विधि वेदानुकूल - प्रतिकूल है या नहीं ये दिखाना नहीं है। हमारा मानना है कि आरम्भ में यज्ञ हिंसामय नहीं थे बल्कि बाद में अज्ञान और लोभ के कारण हुए। अशोक का भी मानना है कि अतीत काल में हिंसा नहीं होती थी इसका प्रमाण अशोक का शिलालेख है जिसका चित्र नीचे दिया है इसमें लिखा है - " अतीत के कुछ कालों में जीवों की हिंसा प्रारम्भ हो...." इससे स्पष्ट है कि ये वैदिक यज्ञों का बिगडा स्वरूप हिंसामय यज्ञ कुछ काल में ही प्रारम्भ हुआ था सम्भवतः बुद्ध से पूर्व और महाभारत के आस-पास। 

यहां अशोक ने यज्ञ करने का निषेध नहीं किया है अपितु यज्ञ में जीव हिंसा का निषेध किया है। अशोक के समय यज्ञ के प्रमाण से सिद्ध है कि उस समय संस्कृत और वेद दोनों थे।



संदर्भित ग्रन्थ एवं पुस्तकें - 

1) अशोक के धर्मलेख - भारत सरकार द्वारा प्रकाशित

2) अष्टाध्यायी - सम्पादक ब्रह्मदत्त जिज्ञासु 


Credits: nastikwad khandan blogspot 



 

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